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Category Archives: नवरात्रि पूजा विधि

2017 Shardiya Navratri Puja Vidhi andDates  शारदीय नवरात्री  पूजा विधि  

2017 Shardiya Navratri Puja Vidhi & Dates  शारदीय नवरात्री  पूजा विधि

maa durga nava roop nine forms of shakti

शारदीय नवरात्रि शुरू हो रहे हैं और आने वाले नौ दिनों तक मां दुर्गा की 9 शक्ति की पूजा- आराधना की जाएगी। इस समय का उपयोग साधक विशिष्ट साधनाओं को सम्पन्न करने में किया करते हैं। यह समय सभी साधको के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस काल में की गयी उपासना का विशेष फल प्राप्त होता है। जो लोग अभी तक किसी कारण से कोई अनुष्ठान अथवा पुरश्चरण नहीं कर सके हैं उन्हें कल से वह अवश्य शरू कर देना चाहिए। यह जरुरी नहीं है कि नवरात्र में केवल माँ दुर्गा की ही उपासना की जाती है बल्कि इस समय आप किसी भी इष्ट देवता के मंत्रो का अनुष्ठान कर सकते हैं। नवरात्र के पहले दिन अपने गुरु देव से मंत्र दीक्षा लेकर, उसका अनुष्ठान करना चाहिए। कुछ साधको के मन में एक प्रश्न रहता है कि क्या नवरात्र में शरू किया गया अनुष्ठान नवरात्र में ही पूर्ण करना जरुरी है , नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है। ये अनुष्ठान आप २१ अथवा ४० दिन में भी पूर्ण कर सकते हैं लेकिन यदि हो सके तो अंतिम नवरात्र तक पूर्ण कर लेना चाहिए। यदि किसी कारण से अनुष्ठान करना सम्भव नहीं है तो नवरात्र में जितना अधिक जप हो सके उतना ही अच्छा है।

नवरात्र में अपने इष्ट देव के सहस्रनाम से अर्चन करना चाहिए। सहस्त्रनाम में देवी/देवता के एक हजार नाम होते हैं। इसमें उनके गुण व कार्य के अनुसार नाम दिए गए हैं। सर्व कल्याण व कामना पूर्ति हेतु इन नामों से अर्चन करने का प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली है। जिसे सहस्त्रार्चन के नाम से जाना जाता है।  सहस्र नामावली के एक-एक नाम का उच्चारण करके देवी की प्रतिमा पर, उनके चित्र पर, उनके यंत्र पर या देवी का आह्वान किसी सुपारी पर करके प्रत्येक नाम के उच्चारण के पश्चात नमः बोलकर देवी की प्रिय वस्तु चढ़ाना चाहिए। जिस वस्तु से अर्चन करना हो वह शुद्ध, पवित्र, दोष रहित व एक हजार से अधिक संख्या में होनी चाहिए।अर्चन में बिल्वपत्र, हल्दी, केसर या कुंकुम से रंग चावल, इलायची, लौंग, काजू, पिस्ता, बादाम, गुलाब के फूल की पंखुड़ी, मोगरे का फूल, चारौली, किसमिस, सिक्का आदि का प्रयोग शुभ व देवी को प्रिय है। यदि अर्चन एक से अधिक व्यक्ति एक साथ करें तो नाम का उच्चारण एक व्यक्ति को तथा अन्य व्यक्तियों को नमः का उच्चारण अवश्य करना चाहिए।सहस्त्रनाम के पाठ करने का फल भी महत्वपूर्ण है। अर्चन की सामग्री प्रत्येक नाम के पश्चात, प्रत्येक व्यक्ति को अर्पित करनी चाहिए। अर्चन के पूर्व पुष्प, धूप, दीपक व नैवेद्य देवी/देवता को अर्पित करना चाहिए। दीपक पूरी अर्चन प्रक्रिया तक प्रज्वलित रहना चाहिए।

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2017  Shardiya Navratri Dates

21 September 2017 ( Thursday ) Pratipada Ghatasthapana Shailputri Puja
22 September 2017 ( Friday ) Dwitiya Brahmacharini Puja
23 September 2017 ( Saturday )  Tritiya Chandraghanta Puja
24 September 2017 ( Sunday ) Chaturthi Kushmanda Puja
25 September 2017 ( Monday ) Panchami Skandamata Puja
26 September 2017 ( Tuesday) Shashthi Katyayani Puja
27 September 2017 ( Wednesday) Saptami Kalaratri Puja
28 September 2017(Thursday ) Ashtami Durga Ashtami Mahagauri Puja Sandhi Puja
29 September 2017 (Friday )Navami Siddhidatri Puja
30 September 2017 (Saturday )  Dashami Navratri Parana

21  सितम्बर 2017 ( गुरुवार) घट स्थापना, शैलपुत्री पूजा
22 सितम्बर 2017 ( शुक्रवार) द्वितीया ब्रह्मचारिणी पूजा
23 सितम्बर 2017 ( शनिवार )  तृतीया चंद्रघंटा पूजा
24 सितम्बर 2017 ( रविवार ) चतुर्थी कुष्मांडा पूजा
25 सितम्बर 2017 ( सोमवार ) पंचमी स्कंदमाता पूजा
26 सितम्बर 2017 ( मंगलवार) षष्ठी कात्यायनी पूजा
27 सितम्बर 2017 ( बुधवार ) सप्तमी कालरात्रि पूजा
28 सितम्बर 2017 (गुरुवार) अष्टमी महागौरी पूजा, दुर्गा महा अष्टमी पूजा,
29 सितम्बर 2017  (शुक्रवार) नवमी  सिद्धिदात्री पूजा
30 सितम्बर 2017 (शनिवार )  दशमी नवरात्री परायण

यह है घट स्थापना का समय

इस बार घटस्‍थापना और पूजा के लिए दो मुहूर्त है एक सुबह का और दूसरा दोपहर का ।  इस दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 06:18 बजे से 8:10 बजे तक एवं  11:49 से दोपहर 12: 37 बजे तक है।
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Magh Gupt Navratri 2017 Dates माघ गुप्त नवरात्रि 2017

Magh Gupt Navratri 2017 Dates माघ गुप्त नवरात्रि 2017

maa durga nava roop nine forms of shakti

प्रत्येक वर्ष आने वाले दो नवरात्रों से तो आप सभी लोग परिचित हैं लेकिन इनके अलावा प्रत्येक वर्ष दो और नवरात्री होती हैं जिन्हें गुप्त नवरात्री कहा जाता है। पूर्व काल में इनका ज्ञान केवल उच्च कोटि के साधकों को होता था जो इस समय का उपयोग विशिष्ट साधनाओं को सम्पन्न करने में किया करते थे।
गुप्त नवरात्र में पूजा, उपासना सामान्य नवरात्रों के समान ही होती हैा तान्त्रिक समाज में इन नवरात्रों का बहुत ही महत्व है, जो इस समय की लगातार प्रतिक्षा करतें हैं।

2017 Magha Gupta Navratri Puja Vidhi & Dates  माघ गुप्त नवरात्री  पूजा विधि   (28th January 2017 – 6th Feburary 2017)

If you need any guidance please call us on 9540674788 (Sumit Girdharwal Ji) . Visit http://www.baglamukhi.info or http://www.yogeshwaranand.org for more info.

Note – we will update this page for more information before 28th January 2017. Keep visiting it everyday for updated information

2017 Magha Gupta Navratri Dates

28 January 2017 ( Saturday ) Pratipada Ghatasthapana Shailputri Puja
29  January 2017 ( Sunday) Dwitiya Brahmacharini Puja
30 January 2017  ( Monday ) Tritiya Chandraghanta Puja
31 January 2017 ( Tuesday ) Chaturthi Kushmanda Puja
01 February 2017 ( Wednesday ) Panchami Skandamata Puja
02 February 2017 ( Thursday ) Shashthi Katyayani Puja
03 February 2017 ( Friday) Saptami Kalaratri Puja
04 February 2017 ( Saturday) Ashtami Durga Ashtami Mahagauri Puja Sandhi Puja
05 February 2017 ( Sunday) Navami Siddhidatri Puja
06 February 2017 ( Monday) Dashami Navratri Parana

28 जनवरी 2017 ( शनिवार ) घट स्थापना, शैलपुत्री पूजा
29 जनवरी 2017 ( रविवार ) द्वितीया ब्रह्मचारिणी पूजा
30 जनवरी 2017  ( सोमवार ) तृतीया चंद्रघंटा पूजा
31 जनवरी 2017 ( मंगलवार) चतुर्थी कुष्मांडा पूजा
01 फरवरी 2017 ( बुधवार ) पंचमी स्कंदमाता पूजा
02 फरवरी 2017 ( गुरुवार) षष्ठी कात्यायनी पूजा
03 फरवरी 2017 ( शुक्रवार) सप्तमी कालरात्रि पूजा
04 फरवरी 2017 ( शनिवार ) अष्टमी महागौरी पूजा, दुर्गा महा अष्टमी पूजा,
05 फरवरी 2017 ( रविवार ) नवमी  सिद्धिदात्री पूजा
06 फरवरी 2017 ( सोमवार ) दशमी नवरात्री परायण

यह है घट स्थापना का समय

माघ गुप्त नवरात्री का पहला दिन इस बार 28 January 2017 को पड़ रहा है। इस दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 09:33 बजे से 10:47 बजे तक है।

यह है कलश स्थापना के लिए सामान

नवरात्रि के लिए मिट्टी का पात्र और जौ, शुद्ध, साफ मिट्टी, शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश, मोली (कलवा), साबुत सुपारी, कलश में रखने के लिए सिक्के, फूल और माला, अशोक या आम के 5 पत्ते, कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन, साबुत चावल, एक पानी वाला नारियल, लाल कपड़ा या चुनरी की आवस्यकता होती है।

ऐसे करें कलश स्थापना

  • नवरात्रि में कलश स्थापना करने के दौरान सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर लें।
  • लकड़ी की चौकी रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं।
  • कपड़े पर थोड़े-थोड़े चावल रखें।
  • चावल रखते हुए सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करें।
  • एक मिट्टी के पात्र में जौ बोयें।
  • इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें।
  • कलश पर रोली से स्वस्तिक या ‘ऊँ’ बनायें।
  • कलश के मुख पर कलवा बांधकर इसमें सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखें।
  • कलश के मुख को चावल से भरी कटोरी से ढक दें।
  • एक नारियल पर चुनरी लपेटकर इसे कलवे से बांधें और चावल की कटोरी पर रख दें।
  • सभी देवताओं का आवाहन करें और धूप दीप जलाकर कलश की पूजा करें।
  • भोग लगाकर मां की पूजा करें।

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गुप्त नवरात्रि साधना (Gupt Navratri Sadhna)

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गुप्त नवरात्रि का महत्व ( Importance Of Gupt Navratri)

These nine days are very good to start any sadhana. If anyone is willing to do dus mahavidya upasana then he/she should not waste this time. These nine days alone can change your life & your future, but it depends on you how you spend your life in these nine days. Those who never had any spiritual experience in their life they should practice mantras in these navaratri. Those who have taken diksha from us they must do anusthaan in this navaratri. It is not compulsory to 1.25 lakh mantras. You can do anusthaan of 21000 mantras, 31000 mantras etc, but you have to complete in nine days only. Homam can be done on 10th day.  Who have already in any anusthaan please do continue it , no new anusthaan is required for them.

Those who have not taken mantra diksha as of yet they should take it in this navaratri as it is the best time.

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Shardiya Navratri 2016 Puja Vidhi शारदीय नवरात्रि

Shardiya Navratri 2016 Puja Vidhi शारदीय नवरात्रि

maa durga nava roop nine forms of shakti

यह है घट स्थापना का समय

शारदीय नवरात्रि का पहला दिन इस बार 01 अक्टूबर 2016 को पड़ रहा है। इस दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 07:46 बजे से 09:14 बजे तक है।

यह है कलश स्थापना के लिए सामान

शारदीय नवरात्रि के लिए मिट्टी का पात्र और जौ, शुद्ध, साफ मिट्टी, शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश, मोली (कलवा), साबुत सुपारी, कलश में रखने के लिए सिक्के, फूल और माला, अशोक या आम के 5 पत्ते, कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन, साबुत चावल, एक पानी वाला नारियल, लाल कपड़ा या चुनरी की आवस्यकता होती है।

ऐसे करें कलश स्थापना

  • नवरात्रि में कलश स्थापना करने के दौरान सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर लें।
  • लकड़ी की चौकी रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं।
  • कपड़े पर थोड़े-थोड़े चावल रखें।
  • चावल रखते हुए सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करें।
  • एक मिट्टी के पात्र में जौ बोयें।
  • इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें।
  • कलश पर रोली से स्वस्तिक या ‘ऊँ’ बनायें।
  • कलश के मुख पर कलवा बांधकर इसमें सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखें।
  • कलश के मुख को चावल से भरी कटोरी से ढक दें।
  • एक नारियल पर चुनरी लपेटकर इसे कलवे से बांधें और चावल की कटोरी पर रख दें।
  • सभी देवताओं का आवाहन करें और धूप दीप जलाकर कलश की पूजा करें।
  • भोग लगाकर मां की पूजा करें।

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Ashadha Gupta Navratri Starting 5th July 2016 गुप्त नवरात्री

Ashadha Gupta Navratri Starting 5th July 2016

maa durga nava roop nine forms of shakti

प्रत्येक वर्ष आने वाले दो नवरात्रों से तो आप सभी लोग परिचित हैं लेकिन इनके अलावा प्रत्येक वर्ष दो और नवरात्री होती हैं जिन्हें गुप्त नवरात्री कहा जाता है। पूर्व काल में इनका ज्ञान केवल उच्च कोटि के साधकों को होता था जो इस समय का उपयोग विशिष्ट साधनाओं को सम्पन्न करने में किया करते थे।
गुप्त नवरात्र में पूजा, उपासना सामान्य नवरात्रों के समान ही होती हैा तान्त्रिक समाज में इन नवरात्रों का बहुत ही महत्व है, जो इस समय की लगातार प्रतिक्षा करतें हैं।

If you need any guidance please call us on 9410030994 (Sumit Girdharwal Ji) or 9917325788 (Shri Yogeshwaranand Ji). Visit http://www.baglamukhi.info or http://www.yogeshwaranand.org for more info.

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Ashwin Shardiya Navratri Dates and Puja Vidhi 13th October – 22nd October 2015

Ashwin  Shardiya Navratri Dates and Puja Vidhi 13th October – 22nd October 2015

 

maa durga nava roop nine forms of shakti

Shardiya Navratri is the most popular and significant Navratri of all Navratris. That’s why Shardiya Navratri is also known as Maha Navratri.

It falls in lunar month Ashwin during Sharad Ritu. The name Shardiya Navratri has been taken from Sharad Ritu. All nine days during Navratri are dedicated to nine forms of Goddess Shakti. This year Shardiya Navratri are falling in the month of October. The nine days festivity culminates on tenth day with Dushera or Vijay Dashmi

These nine days are very good to start any sadhana. If anyone is willing to do dus mahavidya upasana then he/she should not waste this time. These nine days alone can change your life & your future, but it depends on you how you spend your life in these nine days. Those who never had any spiritual experience in their life they should practice mantras in these navaratri. Those who have taken diksha from us they must do anusthaan in this navaratri. It is not compulsory to 1.25 lakh mantras. You can do anusthaan of 21000 mantras, 31000 mantras etc, but you have to complete in nine days only. Homam can be done on 10th day. Who are already in any anusthaan please do continue it , no new anusthaan is required for them. ( Incase you had already started any anusthan before navaratri)

Those who have not taken mantra diksha as of yet they should take it in this navaratri as it is the best time.
Navaratri Schedule –
Navaratri Day 1 (13th October 2015 Tuesday) Pratipada Tithi
Ghatasthapana & Shailpurti Puja

Ghatasthapana Muhurta = 06:24 AM to 10:12AM

Navaratri Day 2 (14th October 2015 Wednesday) Pratipada Tithi
Chandra Darshan
Navaratri Day 3 (15th October 2015 Thursday) Dwitia Tithi
Brahmacharini Puja
Navaratri Day 4 (16th October 2015 Friday) Tritiya Tithi
Chandraghanta Puja
Navaratri Day 5 (17th October 2015 Saturday) Chaturthi Tithi
Kushmanda Puja
Navaratri Day 6 (18th October 2015 Sunday) Panchami Tithi
Skandamata Puja
Navaratri Day 7 (19th July October Monday) Shasthi Tithi
Katyayani Puja
Navaratri Day 8 (20nd October 2015 Tuesday) Saptami Tithi
Kalaratri Puja
Navaratri Day 9 (21st October 2015 Wednesday) Ashtami Tithi
Mahagauri Puja (Durga Ashtami)
Navaratri Day 10 (22nd October 2015 Thursday) Navami Tithi
Siddhidatri Puja (Durga Navmi)
Navaratri Day 11 (23rd October 2015 Friday) Dashami Tithi
Navaratri Parayana
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Ashadha Gupta Navratri 2015 Dates & Puja Vidhi

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maa durga nava roop nine forms of shakti

Ashadha Navratri, also known as Gupta Navratri, is nine days period dedicated to the nine forms of Shakti or mother Goddess. It falls in the month of Ashadha during June or July. Gupta Navaratri is also known as Gayatri Navratri.

These nine days are very good to start any sadhana. If anyone is willing to do dus mahavidya upasana then he/she should not waste this time. These nine days alone can change your life & your future, but it depends on you how you spend your life in these nine days. Those who never had any spiritual experience in their life they should practice mantras in these navaratri. Those who have taken diksha from us they must do anusthaan in this navaratri. It is not compulsory to 1.25 lakh mantras. You can do anusthaan of 21000 mantras, 31000 mantras etc, but you have to complete in nine days only. Homam can be done on 10th day.  Who have already in any anusthaan please do continue it , no new anusthaan is required for them.

Those who have not taken mantra diksha as of yet they should take it in this navaratri as it is the best time.

Navaratri Schedule –

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Magha Gupta Navaratri 2015 गुप्त नवरात्री

Magha Gupta Navratri 2015 गुप्त नवरात्री

प्रत्येक वर्ष आने वाले दो नवरात्रों से तो आप सभी लोग परिचित हैं लेकिन इनके अलावा प्रत्येक वर्ष दो और नवरात्री होती हैं जिन्हें गुप्त नवरात्री कहा जाता है। पूर्व काल में इनका ज्ञान केवल उच्च कोटि के साधकों को होता था जो इस समय का उपयोग विशिष्ट साधनाओं को सम्पन्न करने में किया करते थे।
गुप्त नवरात्र में पूजा, उपासना सामान्य नवरात्रों के समान ही होती हैा तान्त्रिक समाज में इन नवरात्रों का बहुत ही महत्व है, जो इस समय की लगातार प्रतिक्षा करतें हैं।

साधना को आरम्भ करने से पूर्व एक साधक को चाहिए कि वह मां भगवती  की उपासना अथवा अन्य किसी भी देवी या देवता की उपासना निष्काम भाव से करे। उपासना का तात्पर्य सेवा से होता है। उपासना के तीन भेद कहे गये हैं:- कायिक अर्थात् शरीर से , वाचिक अर्थात् वाणी से और मानसिक- अर्थात् मन से।  जब हम कायिक का अनुशरण करते हैं तो उसमें पाद्य, अर्घ्य, स्नान, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पंचोपचार पूजन अपने देवी देवता का किया जाता है। जब हम वाचिक का प्रयोग करते हैं तो अपने देवी देवता से सम्बन्धित स्तोत्र पाठ आदि किया जाता है अर्थात् अपने मुंह से उसकी कीर्ति का बखान करते हैं। और जब मानसिक क्रिया का अनुसरण करते हैं तो सम्बन्धित देवता का ध्यान और जप आदि किया जाता है।
जो साधक अपने इष्ट देवता का निष्काम भाव से अर्चन करता है और लगातार उसके मंत्र का जप करता हुआ उसी का चिन्तन करता रहता है, तो उसके जितने भी सांसारिक कार्य हैं उन सबका भार मां स्वयं ही उठाती हैं और अन्ततः मोक्ष भी प्रदान करती हैं। यदि आप उनसे पुत्रवत् प्रेम करते हैं तो वे मां के रूप में वात्सल्यमयी होकर आपकी प्रत्येक कामना को उसी प्रकार पूर्ण करती हैं जिस प्रकार एक गाय अपने बछड़े के मोह में कुछ भी करने को तत्पर हो जाती है। अतः सभी साधकों को मेरा निर्देष भी है और उनको परामर्ष भी कि वे साधना चाहे जो भी करें, निष्काम भाव से करें। निष्काम भाव वाले साधक को कभी भी महाभय नहीं सताता। ऐसे साधक के समस्त सांसारिक और पारलौकिक समस्त कार्य स्वयं ही सिद्ध होने लगते हैं उसकी कोई भी किसी भी प्रकार की अभिलाषा अपूर्ण नहीं रहती ।
मेरे पास ऐसे बहुत से लोगों के फोन और मेल आते हैं जो एक क्षण में ही अपने दुखों, कष्टों का त्राण करने के लिए साधना सम्पन्न करना चाहते हैं। उनका उद्देष्य देवता या देवी की उपासना नहीं, उनकी प्रसन्नता नहीं बल्कि उनका एक मात्र उद्देष्य अपनी समस्या से विमुक्त होना होता है। वे लोग नहीं जानते कि जो कष्ट वे उठा रहे हैं, वे अपने पूर्व जन्मों में किये गये पापों के फलस्वरूप उठा रहे हैं। वे लोग अपनी कुण्डली में स्थित ग्रहों को देाष देते हैं, जो कि बिल्कुल गलत परम्परा है। भगवान शिव ने सभी ग्रहों को यह अधिकार दिया है कि वे जातक को इस जीवन में ऐसा निखार दें कि उसके साथ पूर्वजन्मों का कोई भी दोष न रह जाए। इसका लाभ यह होगा कि यदि जातक के साथ कर्मबन्धन शेष नहीं है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। लेकिन हम इस दण्ड को दण्ड न मानकर ग्रहों का दोष मानते हैं।

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स्कन्दमाता ( Ma Skandamata is worshiped on fifth day of Navaratri )

Skanda-Mata-mantra-evam-puja-vidhi

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सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कंद माता यशस्विनी॥

भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया था अतः  नवरात्र  में  महादेव की पूजा अवश्य  करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है। प्रतिदिन कम से कम ग्यारह माला शिव पंचाक्षरी मंत्र “नमः शिवाय” की अवश्य  करें एवं शिवलिंग पर जल चढ़ाये ।

नवरात्र के नौ दिन दुर्गा मां के भक्तों के लिए अपने नौ ग्रहों को शांत कराने का अहम मौका होता है। नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है. वात्सल्य की प्रतिमूर्ति मां स्कंदमाता भगवान स्कंद को गोदी में लिए हुए हैं और इनका यह रूप साफ जाहिर करता है कि यह ममता की देवी अपने भक्तों को अपने बच्चे के समान समझती हैं। साथ ही मां स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वत: हो जाती है।

नवरात्र व्रत विधि और मंत्र

नवरात्र पर्व  के दिनों में व्रत रखने के अतिरिक्त जो सबसे अहम कार्य करना होता है वह है मां की पूजा-अर्चना और उनकी अराधना करना।  मां दुर्गा और उनके रूपों की पूजा करने के लिए अलग-अलग विधियां और सभी देवियों के अलग मंत्र हैं जिनकी सहायता से मां दुर्गा और अन्य देवियों की पूजा की जाती है।

मां स्कंदमाता के मंत्र और पूजन विधि.

शक्ति के इस स्वरूप की उपासना पांचवें दिन की जाती है। देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कन्द यानि भगवान कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाताके नाम से जानते हैं। यह शक्ति व सुख का एहसास कराती हैं। ये सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसी कारण इनके चेहरे पर तेज विद्यमान है। इनका वर्ण शुभ्र है।

भगवान स्कंद (भगवान कार्तिकेय) बाल रूप में स्कंदमाता की गोद में बैठे हैं। यही देवी का स्वरूप है जो साफ दर्शाता है कि मां वात्सल्य से ओतप्रोत हैं। यह हमारे भीतर कोमल भावनाओं में अभिवृद्धि करता है।  आंतरिक व बाह्य जीवन को पवित्र व निष्पाप बनाते हुए आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है।

मां की उपासना के साथ ही भगवान स्कंद की उपासना स्वयं ही पूर्ण हो जाती है,  क्योंकि भगवान बालस्वरूप में सदा ही अपनी मां की गोद में विराजमान रहते हैं।  भवसागर के दु:खों से छुटकारा पाने के लिए इससे दूसरा सुलभ साधन कोई नहीं है.

मां स्कंदमात का स्वरूप

स्कन्दमाता कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है।  इनका वाहन भी सिंह है। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री भी कहा जाता है।  यह दोनों हाथों में कमंडल लिए हुए हैं। स्कन्द माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छह सिर वाली देवी का है।  अतः इनकी पूजा-अर्चना में मिट्टी की 6 मूर्तियां सजाना जरूरी माना गया है।

कैसे करें मां स्कंदमाता- की पूजा

माना जाता है कि मां स्कंदमाता की उपासना से मन की सारी कुण्ठा जीवन-कलह और द्वेष भाव समाप्त हो जाता है। मृत्यु लोक में ही स्वर्ग की भांति परम शांति एवं सुख का अनुभव प्राप्त होता है।  साधना के पूर्ण होने पर मोक्ष का मार्ग स्वत: ही खुल जाता है.

साधना विधान

सर्वप्रथम मां स्कंद माता की मूर्ति अथवा तस्वीर को लकडी की चौकी पर पीले वस्त्र को बिछाकर उस पर कुंकुंम से ॐ लिखकर स्थापित करें। मनोकामना की पूर्णता के लिए हाथ में पीले पुष्प लेकर मां स्कंद माता के दिव्य ज्योति स्वरूप का ध्यान करें।

ध्यान के बाद हाथ के पुष्प चौकी पर छोड दें।  तदुपरांत  मां का पंचोपचार विधि द्वारा पूजन करें।  पीले नैवेद्य का भोग लगाएं तथा पीले फल चढ़ाएं।  इसके बाद मां के श्री चरणों में प्रार्थना कर आरती पुष्पांजलि समर्पित करें तथा भजन कीर्तन करें.

स्कंदमाता के मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

ध्यान मंत्र –

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कंद माता यशस्विनी॥

 

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कूष्माण्डा (Ma Kushmanda is worshiped on fourth day of Navaratri )

maa-Kushmanda-ki-puja-vidhi

सुरासम्पूर्णकलशं       रूधिराप्लुतमेव     च   ।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ।।

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भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया था अतः  नवरात्र  में  महादेव की पूजा अवश्य  करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है। प्रतिदिन कम से कम ग्यारह माला शिव पंचाक्षरी मंत्र “नमः शिवाय” की अवश्य  करें एवं शिवलिंग पर जल चढ़ाये ।

नवरात्री  दुर्गा पूजा चौथे तिथि – माता कूष्माण्डा की पूजा :

मां दुर्गा के नव रूपों में चौथा रूप है कूष्माण्डा देवी का । दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा जी की पूजा का विधान है । देवी कूष्माण्डा अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है ।

इस दिन भक्त का मन ‘अनाहत’ चक्र में स्थित होता है, अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए. संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है ।

देवी कुष्मांडा कथा :

दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा है कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा. इसका अर्थ है वह देवी जिनके  उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्माण्डा हैं । देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं । जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था ।

देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंडल सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है, उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्माण्ड  का जन्म हुआ ।  देवी का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यें सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं।

देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है. देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है । देवी के आठवें हाथ में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है । देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं। जो भक्त श्रद्धा पूर्वक  देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है।

देवी कुष्मांडा पूजा विधि :

जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को अनहत चक्र (Anhat chakra) में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए । इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कूष्माण्डा सफलता प्रदान करती हैं जिससे व्यक्ति सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है और मां का अनुग्रह प्राप्त करता है।

दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा की पूजा का विधान उसी प्रकार है जिस प्रकार देवी ब्रह्मचारिणी और चन्द्रघंटा की पूजा की जाती है । इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं । इनकी पूजा के पश्चात देवी कूष्माण्डा की पूजा करे: पूजा की विधि शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर इस मंत्र का ध्यान करें ।

“सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च. दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे..”

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

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चंद्रघंटा (Ma Chandraghantra is worshiped on third day of Navaratri )

chandraghanta

 

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पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं की पूजा-आराधना की जाता है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना हमेशा फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है इसलिए इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग सोने के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं. इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है, इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

मां का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

On third day of Navratri,  Goddess is worshipped in Her Chandraghanta form. Those who worship Goddess Chandraghanta on the third day of Navratri are blessed with eternal strength and everlasting happiness. The Goddess wears the half moon in a bell shape. Hence, this form of the Goddess is known as Chandraghanta. She has a golden complexion, possesses ten hands and rides a tiger. She has weapons in her eight hands. And in the remaining two, one hand has a bell and the other is in the pose of giving blessings to Her devotees. During the battle between the Gods and demons, the horrible sound of the Goddess’ bell or ghanta sent thousands of demons to the abode of death. Her warring pose shows Her eagerness to destroy all the bad forces which are troubling Her devotess. Goddess Chandraghanta is the representation of Supreme bliss and knowledge. It is said that by Her blessings, all the sins, sufferings, bad energies etc are eliminated from Her devotees’ life. By riding a tiger She inspires Her devotees to be fearless. By worshiping Goddess Chandraghanta one gets rid of all the worldly sorrows and attains supreme spiritual bliss.

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