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Dumavati (धूमावती)

Dhumavati Mantra Sadhana Evam Siddhi

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जिनकी अनुकम्पा से ब्रह्मा सृष्टि की संरचना में समर्थ होते हैं, भगवान विष्णु जिनकी कृपा-कटाक्ष से विश्व का पालन करने के योग्य हो पाते हैं और भगवान रुद्र जिनके बल से विश्व का संहार करने में सक्षम होते हैं, उन्हीं सर्वेश्वरी जगन्माता महामाया के दश स्वरूपों में से एक स्वरूप भगवती धूमावती का भी है। यद्यपि भगवान शिव जगत्-कल्याण के अधिष्ठाता हैं लेकिन कल्याण-मूर्ति शिव का कल्याण केवल और केवल शक्ति-सत्ता पर निर्भर है। शिवतत्व निश्चय ही शक्ति-तत्व पर आश्रित है।

हिन्दू-धर्म के अनुसार ‘शक्ति’ ईश्वरत्व का सर्वोच्च स्वरूप है। यही प्रकृति का व्यक्त अथवा साकार स्वरूप भी है। इसे ही ईश्वर की सर्वव्यापक शक्ति माना जाता है। शक्ति को हम भिन्न-भिन्न रूपों में देखते हैं, भले ही यह भेदभाव की दृष्टि हमारी अल्पज्ञता का प्रतीक हो। अपने भिन्न-भिन्न रूपों में होते हुए भी मूलशक्ति एक ही है, वही सब में है और सभी उसी परम सत्ता में व्याप्त है। ब्रह्म और अब्रह्म भी वही है। “देव्यथर्वशीर्ष में भगवती स्वयं एक स्थान पर कहती हैं –  “अहं ब्रह्मस्वरूपिणी” तथा “अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये”। जिस प्रकार विद्युतीय ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं प्रत्येक स्थान पर पृथक्-पृथक् कार्य सम्पादित करती है, लेकिन उसका स्वरूप एक ही है, उसकी शक्ति एक ही है। एक ही महाशक्ति भिन्न-भिन्न नामों एवं रूपों में प्रकट होकर भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करती है। एक ओर वह रचनात्मक कार्य करती है तो दूसरी ओर विध्वंसात्मक कार्यों के द्वारा सृष्टि को व्यवस्थित और नियंत्रित करती है। एक ओर वह विश्वप्रसूता के रूप में माता कहलाती है तो दूसरी ओर जगत्-रक्षक तथा पालक के रूप में जगत्पिता कहलाती है। एक ओर लक्ष्मीरूप में जगत् को सरस, सुरम्य और सुखपूर्ण बनाती है तो दूसरी ओर अलक्ष्मीरूप में स्वेच्छाचारी, ऐश्वर्योन्मत्त और कुमार्गरत् प्राणियों को भिन्न-भिन्न प्रकार के दण्ड देकर सुमार्ग पर लाती है। वह विराट, अचिन्त्य शक्ति एक ओर ईश्वर तथा दूसरी ओर भगवती के नाम से जानी जाती है।

दशों महाविद्याओं में इन्हें ‘दारुण विद्या’ भी कहा गया है। शाप देने और नष्ट करने तथा संहार करने की जितनी भी क्षमतायें हैं वे सब देवी के कारण ही हैं। क्रोधमय ऋषियों जैसे कि दुर्वासा, अंगिरा, परशुराम, भृगु आदि की शक्ति भगवती धूमावती ही हैं। यूं तो यह शक्ति सर्वत्र व्याप्त है लेकिन ‘ज्येष्ठा नक्षत्र’ तो इसका मूल है। वहीं से इस ‘आसुरी कलहप्रिया’ की उत्पत्ति होती है। यही हमारी साक्षात् ‘धूमावती’ हैं। यही कारण है कि ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक जीवन- पर्यन्त दारिद्रय, दुख और शोक का भोग करता है। धूमावती देवी का अनुष्ठान, पूजन आदि भी विशेष रूप से ज्येष्ठा नक्षत्र में अथवा ज्येष्ठ मास में ही सम्पन्न किया जाता है, उसका भी यही कारण है। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार भगवती धूमावती का सम्बन्ध केतु ग्रह से है। इन शास्त्रों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में केतु ग्रह उत्तम स्थान पर बैठा हो अथवा केतु ग्रह से सहायता मिल रही हो तो जातक को जीवन में दुख, दारिद्रय और दुर्भाग्य से छुटकारा मिल जाता है। इस ग्रह की प्रबलता के कारण जातक सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त रहता है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। यह भी पूर्णतः सत्य है कि इनकी साधना, स्तुति करने वाला साधक कभी दरिद्र नहीं होता और वह सभी प्रकार के कष्टों से दूर रहता है।

दश महाविद्याओं में सातवीं महाविद्या होने के कारण भगवती धूमावती का सांकेतिक नाम ”सप्तमी“ भी है। ‘ज्येष्ठा’ भी इन्हीं को कहा जाता है। विश्व की जो भी अमांगल्यपूर्ण अवस्थायें हैं, उनकी अधिष्ठात्री शक्ति धूमावती ही हैं। ये विधवा मानी जाती हैं, इसलिए इनके साथ पुरुष का वर्णन नहीं है। यहां पुरुष अव्यक्त है। धन-रक्षा, पुत्र-लाभ और शत्रु पर विजय-प्राप्ति के लिए इनकी साधना-उपासना की जाती है। पूर्व जन्मों के दोषों को समूल नाश करने में भी यह शक्ति अग्रणीय है।श्वेतरूप व धूम्र अर्थात् धुंआ इनको अति प्रिय है तथा पृथ्वी के आकाश में स्थित बादलों में इनका निवास होता है। यह भी माना जाता है कि कुण्डलिनी चक्र के मूल में कूर्म में इनकी शक्ति विद्यमान होती है। वाराही विद्या में इन्हें धूम्रवाराही कहा जाता है, जो शत्रुओं के मारण एवं उच्चाटन कर्मों में प्रयोग की जाती है।

महाविद्यायें दश कही गयी हैं, यथा  (1) काली (2) तारा (3) षोडशी (4) भुवनेश्वरी (5) भैरवी (6) छिन्नमस्ता (7) धूमावती (8) बगलामुखी (9) मातंगी तथा (10) कमला। 

उपर्युक्त क्रमानुसार भगवती धूमावती महाविद्याओं में सप्तम् स्थान पर अवस्थित हैं। तन्त्र-ग्रन्थों के अनुसार धूमावती उग्रतारा ही हैं, जो धूम्रा होने से धूमावती कही गयी हैं। इन्हें दुर्गासप्तशती में ‘वाभ्रवी’ और ‘तामसी’ का नाम दिया गया है। ऋग्वेदोक्त रात्रिसूक्त में इन्हें ‘सुतरा’ कहा गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है – सुखपूर्वक तारने योग्य। तारा अथवा तारिणी का भी यही अर्थ है। इसलिए तारा को धूमावती देवी का पूर्वरूप कहा गया है।

भगवती धूमावती के सन्दर्भ में कहा जाता है कि एक बार भगवती पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर विराजित थीं। तभी पार्वती जी को बहुत जोर की भूख लगी। पार्वती जी ने भगवान शिव से अपनी भूख का निवारण करने हेतु निवेदन किया। लेकिन भगवान शिव ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। भूख से व्याकुल पार्वती जी को अपनी उपेक्षा पर अत्यधिक क्रोध आ गया और उन्होंने महादेव को ही निगल लिया। इससे उनके शरीर से धूम राशि निकली, जिससे पार्वती जी का सम्पूर्ण शरीर धुंए से ढक गया। उस समय महादेव ने कहा कि ”आपकी सुन्दर मूर्ति धुंए से आप्लावित हो गयी है, इसलिए अब आपको धूमावती या धूम्रा कहा जायेगा। इस प्रकार इन देवी का नाम धूमावती के नाम से विख्यात हुआ। शिव को निगल जाने के कारण ये अकेली हैं और इनका कोई स्वामी अथवा नियंत्रक  नहीं है, अतः आप स्वनियंत्रिका का हैं। इसी कारण से इन्हें विधवा भी कहा गया है।

देवी धूमावती शत्रुओं का विनाश करने वाली महाशक्ति और साधक के दुखों की निवृत्ति करने वाली महाविद्या हैं। ये चारों पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्रदान करने वाली हैं। इनकी साधना-उपासना करने वाले व्यक्ति को कभी भी शत्रु के समक्ष पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता। अपने साधक के शत्रु का सर्वनाश करने में यह महाविद्या अत्यन्त ही कठोर हैं। ये दारूण विद्या हैं और वैधव्य जीवन व्यतीत करती हैं। पुरुष-शून्य महाशक्ति माने जाने के कारण इनका कोई ‘शिव’ नहीं है। शायद इसीलिए ये निरंकुशा भी हैं।

भगवती धूमावती के अंग देवता के रूप में अघोर रुद्र हैं। बटुक, प्रत्यंगिरा, शरभ-शालुव पक्षिराज भी इनके अंग देवता हैं, जो अत्यन्त ही उग्र विद्या के रूप में स्थापित हैं।

एक उत्तम श्रेणी का साधक सदैव यह कामना करता है कि इस सभ्य समाज में रहने वाले सभी प्राणी द्वेष भावना से रहित हों, ताकि समाज में व्याप्त सभी बुराइयों का समूल नाश हो सके। द्वेष-भावना ही अनेक प्रकार की बुराइयों को जन्म देने वाली है, इसलिए यदि द्वेष-भाव की यह दुर्भावना ही समाप्त हो जाये तो समाज के सभी वर्ग प्रसन्न एवं तृप्त हो पायेंगे। यद्यपि इस बुराई को समाप्त करने की शक्ति सभी व्यक्तियों के अन्दर निहित है, लेकिन विकसित न होने के कारण वे इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। इसके लिए ही उन्हें गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु ही वह व्यक्ति है जो साधक को उसके भीतर की इस शक्ति को जगाने का, इसे विकसित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। भगवती धूमावती की साधना के माध्यम से यह शक्ति प्राणी के भीतर बहुत अधिक तीव्रता के साथ विकसित होती है।

व्यवहारिक रूप से एक बात यह भी अनुभव में आयी है कि जब हमारे द्वारा किये गये या कराये गये बगलामुखी आदि के अनुष्ठान भी कोई फल प्रदान नहीं करते हैं, उस समय यदि पहले धूमावती का अनुष्ठान सम्पन्न करके अथवा धूमावती मन्त्र के साथ संयोजित करके अन्य कोई अनुष्ठान सम्पन्न कराया जाये तो उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।

बगलामुखी मन्त्र के साथ यदि धूमावती मन्त्र के सम्पुट से अनुष्ठान सम्पन्न किया जाये तो वह विशेष रूप से शत्रु-विनाशक हो जाता है। चूंकि ये दोनों महाविद्यायें ही बहुत तीव्र प्रभाव वाली हैं और घोर शत्रु-विनाशक भी हैं, इसलिए आवश्यक है कि अनुष्ठान- कर्ता को दोनों महाविद्याओं के प्रयोग में दक्ष एवं दीक्षित होना चाहिए। अधूरा ज्ञान सदैव नाश का द्योतक होता है और ये दोनों महाविद्यायें ही दोधारी तलवार के समान हैं, जो तनिक भी त्रुटि होने पर अनुष्ठानकर्ता को अथवा यजमान, दोनों को समान रूप से क्षति पहुंचा सकती हैं, इसलिए इनके प्रयोग में प्रवीणता आवश्यक है।

भगवती धूमावती सप्तम महाविद्या हैं जो बहुत ही तीव्र और शीघ्र परिणाम प्रदान करने वाली हैं। इसीलिए इन्हें ” उग्र कोटि “ की श्रेणी में स्थापित किया गया है। अतः इनकी साधना सम्पन्न करने के लिए साधक को सर्वप्रथम गुरु-दीक्षा लेनी चाहिए, क्योंकि सही मार्ग-दर्शन के अभाव में त्रुटि होना सम्भव है, जो साधक के हित में नहीं है। उनके मंत्र की दीक्षा के अभाव में श्री धूमावती महाविद्या के मंत्र की उपासना साधक को सफलता प्रदान नहीं कर सकती, ऐसी ही परम्परा है। इनकी दीक्षा किसी शुक्ल पक्ष के शुभ दिन में अथवा उत्साह में किसी गुरुवार के दिन किसी योग्य गुरु से प्राप्त करनी चाहिए। तत्पश्चात् साधक को पुरश्चरण के लिए तत्पर होना चाहिए।

।। उचित समय तथा विधि।।

वैसे भगवती धूमावती की साधना चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण में शीघ्र फलदायी है। यदि ऐसा कोई ग्रहण पड़ रहा है तो ग्रहण काल आरम्भ होते ही इनकी साधना आरम्भ करके ग्रहण काल के समापन तक करने का विधान है। इनकी साधना के लिए एक एकान्त कमरे में पवित्र स्थान पर आम की लकड़ी से बना सिंहासन स्थापित करके उसके ऊपर एक सफेद चादर बिछाकर धूमावती का चित्र स्थापित करें। सिंहासन के चारों कोनों अर्थात् चारों दिशाओं में गाय के शुद्ध घी के चार चैमुख दीपक जलायें। सुगन्धित धूप अथवा अगरबत्ती जलायें। सफेद वस्त्र धारण करें तथा पूजन में पुष्प, अक्षत्, सफेद चन्दन तथा नैवेद्य आदि सभी वस्तुयें सफेद रंग की प्रयोग में लायें। सिंहासन पर चित्र के सामने किसी प्लेट में श्वेत कपड़ा बिछायें अथवा श्वेत पुष्प बिछाकर प्राण-प्रतिष्ठित यन्त्र की स्थापना करें। माला मोती अथवा आक की लकड़ी से बनी हुई प्रयोग में लायें। हवन सामग्री में कौए के पंख अवश्य मिलायें। यदि ग्रहण काल न हो तो इनकी साधना किसी भी कृष्ण पक्ष के शनिवार से आरम्भ करनी चाहिए। ज्येष्ठा नक्षत्र में इनकी साधना आरम्भ करना विशेष फल प्रदान करने वाला होता है। साधना 40 दिनों में पूर्ण करें। अनुष्ठान काल में सभी निर्धारित नियमों का पालन करते हुए अन्तिम दिन यानि 41वें दिन सम्पूर्ण किये गये जप का दशांश हवन करें। तत्पश्चात् हवन के दशांश मन्त्रों से तर्पण और तर्पण के दशांश मन्त्रों से मार्जन करके इसके दशांश संख्या में कन्याओं अथवा ब्राह्मणों को भोजन कराकर तृप्त करें तथा यथा-योग्य दान-दक्षिणा प्रदान करें। अपने माता-पिता का आशीर्वाद लें तथा गुरुदेव को यथा-योग्य दान-दक्षिणा प्रदान करके उन्हें सन्तुष्ट करें। सदैव स्मरण रखें कि अपने बुजुर्गों तथा गुरुदेव का आशीर्वाद ही आपकी साधना को सफलता प्रदान करता है। इसीलिए साधना के क्षेत्र में गुरु को माता-पिता और भगवान से अधिक सम्मान दिया जाता है।

मानसोपचार पूजन –  देवी का मानसोपचार पूजन करें –
ॐ लं पृथिव्यात्मकं धूमावत्यै गंध्ं परिकल्पयामि।
ॐ हं आकाशात्मकं धूमावत्यै पुष्पं परिकल्पयामि।
ॐ यं वायव्यात्मकं धूमावत्यै धूपं परिकल्पयामि।
ॐ रं अग्न्यात्मकं धूमावत्यै दीपं परिकल्पयामि।
ॐ वं अमृतात्मकं धूमावत्यै नैवेद्यं परिकल्पयामि।
ॐ सं सौमात्मकं धूमावत्यै ताम्बूलं परिकल्पयामि।

इसका विनियोग निम्नवत् है –

विनियोग –  अस्य श्री धूमावती मन्त्रस्य नारसिंह ऋषिः , पंक्तिश्छंदः, धूमावती (ज्येष्ठा) देवता, धूं  बीजं, स्वाहा शक्तिः शत्रु निग्रहे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास  – इसके उपरान्त ऋष्यादिन्यास करें
शिरसि नारसिंह ऋषये नमः।
मुखे पंक्तिश्छन्दसे नमः।
हृदि धूमावती देवतायै नमः।
धूं  बीजाय नमः गुह्ये।
स्वाहा शक्तये नमः पादौ।

अंगन्यास –  इसके बाद अंगन्यास करें – 

ॐ धां हृदयाय नमः।
ॐ धीं शिरसे स्वाहा।
ॐ धूं शिखायै वषट्।
ॐ धैं कवचाय हुम्।
ॐ धौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ धः अस्त्राय फट्।

करन्यास – इसके उपरान्त करन्यास करें – 

ॐ धां अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ धीं तर्जनीभ्यां स्वाहा।
ॐ धूं मध्यमाभ्यां वषट्।
ॐ धैं अनामिकाभ्यां हुम्।
ॐ धौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्।
ॐ धः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।

सप्ताक्षर मंत्र (saptakshara mantra) – धूं  धूमावती स्वाहा। ( dhūṃ  dhūmāvatī svāhā)

अष्टाक्षर मंत्र (ashtakshara mantra) – धूं  धूं  धूमावती स्वाहा। (dhūṃ  dhūṃ  dhūmāvatī svāhā)

अष्टाक्षर मंत्र (ashtakshara mantra)-  धूं  धूं  धूमावती ठः ठः (dhūṃ  dhūṃ  dhūmāvatī ṭhaḥ ṭhaḥ)

नवमाक्षर मंत्र  धूं धूं  धूं  धूमावती स्वाहा। dhūṃ  dhūṃ  dhūṃ  dhūmāvatī svāhā

Dhumavati Mantra

Dhumavati Mantra part 2

Dhumavati Kavach in Hindi and Sanskrit ( धूमावती कवच )

dhumavati kavach धूमावती कवच page 1

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Dhumavati Sadhana Benefits in Hindi

ma dhumavati saptakshar mantra dhum dhumavati swaha

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  1. Sir
    I want to be getting shidha of dumawati devi
    So I am requesting to pls help me as professor ( like guru)

    Thanks & regards
    Subhash kumar

  2. I Need Dhumavati Hymns, Ashtakam, Chalisa in english to praise her.

  1. Pingback: Dhumavati Jayanti on 26th May 2015 | Mahavidya Shri Baglamukhi Sadhana Aur Siddhi

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